प्रसिद्ध साहित्यकार यतींद्र मिश्र बोले; यह शताब्दी उनकी ऋणी है:उन्हें यहीं छोड़ पिता से कुछ नया सीखने उस गन्धर्व लोक चली गयी,अनकहे अन्तरालों में निःशब्द पसर गयी

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