- सुप्रीम कोर्ट की सरकार को फटकार, कहा – सरकार आरबीआई के पीछे नहीं छुप सकती
- मोरेटोरियम (Moratorium) के नाम पर सरकार का खेल, कोरोना महामारी के चलते आर्थिक समस्या से जूझ रहे असंख्य नागरिकों पर बैंकिंग एजेंसियां किश्तों के भुगतान के लिए बना रही जबरन दबाव
सम्पादकीय

संदीप सिंह नोएडा की निजी कंपनी में ऑपरेशन मैनेजर के तौर पर काम करते हैं। कोरोना महामारी लॉकडाउन के चलते कंपनी ने संदीप का 40 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन कम कर 27 हजार कर दिया। बकौल संदीप, घर का किराया, मेंटिनेंस और बिजली, बेटे की स्कूल फीस, घर के राशन पानी आदि में होने वाला खर्च, वर्तमान में मिलने वाले 27 हजार रुपये के मासिक वेतन से कहीं ज़्यादा है। संदीप क्रेडिट कार्ड यूज़र भी हैं व इस वर्ष मार्च तक अपनी सभी किश्तों का भुगतान समय पर भी करते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से हुयी वेतन कटौती के चलते किश्त भुगातन की समस्या देखते हुए उन्होंने मोरेटोरियम (Moratorium) ले लिया। बाद फिर क्या था, लॉकडाउन की अवधि के दौरान बैंक द्वारा चक्रवृद्धि ब्याज चार्ज करने से क्रेडिट कार्ड की लिमिट पूरी हो गयी जिसके बाद से ही बैंकिंग एजेंसियां संदीप को फोन कॉल के माध्यम से लगातार वसूली के लिए धमका रहे हैं। संदीप का कहना है कि इतने वेतन में वो अपने परिवार का पेट नहीं भर पा रहे हैं तो क्रेडिट कार्ड की किश्त कैसे चुका पाएंगे।
अमूमन कुछ यही हाल गुरुग्राम की निजी आईटी कंपनी में कार्यरत नफीस अहमद का भी है। लॉकडाउन के दौरान नफीस को जबरन कंपनी से इस्तीफ़ा देना पड़ा और तब से अभी तक नफीस को नौकरी नहीं मिल पायी है। ऐसे में बैंकिंग एजेंसियां नफीस को धमकी भरे कॉल कर उन पर किश्तों के भुगतान के लिए दबाव बना रही हैं।
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देश में लाखों लोगों का यही हाल है जिन पर एजेंसियों द्वारा किश्तों के भुगतान का दबाव बनाया जा रहा है लेकिन उनके मौजूदा हालात इतने बदतर हैं कि वो अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने में भी असमर्थ हैं तो ऐसे में किश्तों का भुगतान उनके लिए बहुत दूर की बात है।
जानकार बताते हैं कि सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन में स्पष्ट कहा गया था कि यदि मोरेटोरियम (Moratorium) की अवधि के दौरान कोई व्यक्ति किश्तों का भुगतान कर सकने में असमर्थ है तो भी उसका सिबिल स्कोर यथावत रहेगा। नोएडा की एक आईटी कंपनी में कार्यरत राहुल शर्मा ने माई नेशन न्यूज़ की टीम को बताया कि सरकार व आरबीआई द्वारा जारी इस गाइडलाइन का बैंको व वित्तीय ससंथाओं ने माखौल बना दिया है। दरअसल राहुल को कुछ लोन की आवश्यकता है लेकिन बैंकिंग एजेंसियों ने उनका लोन एप्लिकेशन यह कह कर खारिज कर दिया कि उन्होंने पिछले दो महीनों से अपने क्रेडिट कार्ड की किश्तों का भुगतान नहीं किया है जबकि राहुल शर्मा यह भुगतान मोरेटोरियम (Moratorium) की अवधि में ही करने में असमर्थ रहे हैं। इसके पहले के सभी भुगतान समय पर ही करते रहे हैं।
31 अगस्त को समाप्त हुई मोरेटोरियम (Moratorium) की अवधि के साथ ही इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस जारी है। लोन मोरेटोरियम अवधि के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि इस फैसले से लोन लेने वालों पर दोहरी मार पड़ रही है क्योंकि उनसे चक्रवृद्धि ब्याज लिया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने कहा, ‘यह योजना दोगुनी मार है क्योंकि हम पर चक्रवृद्धि ब्याज चार्ज किया जा रहा है। ब्याज पर ब्याज वसूलने के लिए बैंक इसे डिफॉल्ट मान रहे हैं। जबकि यह हमारी तरफ से डिफ़ॉल्ट नहीं है। सभी सेक्टर बैठ गए हैं लेकिन आरबीआई चाहता है कि बैंक कोविड-19 के दौरान मुनाफा कमाए और यह अनसुना है।’
कर्जदारों के वकील राजीव दत्ता ने सुप्रीम कोर्ट में बैंकों को मोरेटोरियम (Moratorium) पीरियड के दौरान ब्याज पर ब्याज वसूलने के लिए कटघरे में खड़ा किया। वकील ने कहा कि ‘बड़े पैमाने पर जनता नर्क में जी रही है, मैं इन सब बातों में नहीं जाना चाहता। आरबीआई हमारी मदद करने के लिए एक योजना लेकर आई, लेकिन ये तो दोहरा आघात है क्योंकि बैंक हम पर चक्रवृद्धि ब्याज लगा रहे हैं।
वकील राजीव दत्ता ने आरोप लगाया कि ‘आरबीआई चाहता है कि बैंक कोरोना काल में और मुनाफा कमाएं, यह सही नही है, सरकार कह रही है कि एक माप से सभी को राहत नही मिल सकती, वह अपना पुनर्गठन कराना चाहते हैं, लेकिन अपने देश के नागरिकों को सजा मत दीजिए, सरकार आरबीआई का बचाव कर रही है।’ दत्ता ने कहा कि ब्याज पर ब्याज लगाना पहली नजर में पूरी तरह से गलत है और इसको नहीं लगाना चाहिए।’
गौरतलब है कि कोरोना और लॉकडाउन की वजह से आरबीआई ने मार्च में लोगों को मोरेटोरियम (Moratorium) यानी लोन की ईएमआई 3 महीने के लिए टालने की सुविधा दी थी। बाद में इसे 3 महीने और बढ़ाकर 31 अगस्त तक के लिए कर दिया गया। आरबीआई ने कहा था कि लोन की किश्त 6 महीने नहीं चुकाएंगे, तो इसे डिफॉल्ट नहीं माना जाएगा। लेकिन मोरेटोरियम (Moratorium) के बाद बकाया पेमेंट पर पूरा ब्याज देना पड़ेगा।
ब्याज की शर्त को कुछ ग्राहकों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनकी दलील है कि मोरेटोरियम में इंटरेस्ट पर छूट मिलनी चाहिए क्योंकि ब्याज पर ब्याज वसूलना गलत है। एक याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई में यह मांग भी रखी कि जब तक ब्याज माफी की अर्जी पर फैसला नहीं होता, तब तक मोरेटोरियम पीरियड बढ़ा देना चाहिए।
फिलहाल मोरेटोरियम (Moratorium) का मुद्दा तो अभी भी सरकार, आरबीआई और सुप्रीम कोर्ट के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है और देश के आम नागरिकों को बैंकिंग एजेंसियों द्वारा जबरन बनाये जा रहे वसूली के दबाव से किसी भी तरह की निजात मिलती नहीं दिख रही है।
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