- वर्ष 1972 में हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय (Sri Hanuman Prashad Poddar Andh Vidyalay) बन कर तैयार हुआ था; विद्यालय को 1984 में दसवीं और 1992 में बारहवीं की सरकारी मान्यता प्राप्त हुई थी
- पूर्वांचल के इस सबसे बड़े अन्धविद्यालय में 250 विद्यार्थियों के पठन-पाठन की आवासीय व्यवस्था है; केवल उत्तरप्रदेश ही नही बल्कि बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, असम आदि राज्यों से भी दृष्टिहीन छात्र यहां पढ़ने आतें है
- इस अन्धविद्यालय को सरकार द्वारा पहले 75 प्रतिशत अनुदान प्राप्त होता था लेकिन सरकार द्वारा विकलांगों को दिव्यांग कहे जाने के बाद 2014 से यह अनुदान कट कर 50₹ हो गया और 2019-20 में सरकार से अनुदान भी बंद हो गया
- लगातार 45 दिनों से जारी है विकलांग छात्रों का अनशन, सरकार व प्रशासन बेसुध
[avatar user=”Manoj Pandey” size=”thumbnail” align=”left”]By Manoj Pandey[/avatar]
वाराणसी। प्रधानमंत्री के हेलीपैड के स्वागत स्थल का नजारा अभय शर्मा के साथ साथ विद्यालय में लगे टीवी स्क्रीन पर पीएम से उनकी आवाज में बात करते अभय शर्मा की आवाज़ सुनते ही पूरा विद्यालय शोर से गूंज उठा था। बेशक ये एक ऐतिहासिक दिन था, हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय (Sri Hanuman Prashad Poddar Andh Vidyalay) के लिए और अभय शर्मा के लिए भी। इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता था। उस समय जिन विकलांगों को अभय शर्मा को दिव्यांजन और बेटा कहते प्रधानमंत्री के मुंह से सुना तो एक बारगी ऐसा लगा जैसे ये दृष्टिहीन होना दुर्भाग्य बदल कर दिव्यांगजन का सौभाग्य बन गया हो, लेकिन अक्सर भावनाओं में लिए गए निर्णय हानिकारक होते है।
खैर ये सब विकलागों को दिव्यांग कह गले लगाने का सीन मात्र फिल्मी मोह माया थी, जिसकी हकीकत बनारस के ऐतिहासिक एक मात्र अंध विद्यालय जिसकी बलि देकर मॉल बनाने के लिए आपदा में अवसर का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए बच्चों के कमरों में ट्रस्ट के मुखिया पूर्वांचल के जाने माने जालान समूह द्वारा रातों रात गोदाम बना दिया जाता है। बच्चों को डाक द्वारा टीसी घर भेजवाया गया। लॉक डाउन में यहीं से बनारस के नामी कारोबारी जालान समूह विद्यालय और छात्रों के बीच एक संघर्ष की शुरुआत होती है, जिसकी अपील छात्रों द्वारा जारी पत्र से समझा जा सकता है।

दिव्यांग बच्चों से उनका विद्यालय छीन मॉल बनाने में लगे पूंजीपति
छात्रों का कहना है कि विकलांगों की सेवा के नाम पर बनारस शहर में व्यापार हो रहा है। यह प्रधानमंत्री का शहर है जहां मोदीजी ने हमारा नया नामकरण किया था। हम विकलांगजनों का नामकरण सरकारे पूर्व में भी करती रही हैं, मगर इस बार प्रधानमंत्री ने हमें दिव्यांग कहा तो हमें लगा कि इस बार हम विकलांगजनों के जीवन में भी क्रांतिकारी सुधार होंगे, मगर ‘दिव्यांग’ शब्द केवल विकलांगता का एक दैवीय आवरण मात्र ही सिद्ध हो सका। विकलांग छात्रों के साथ तस्वीरों में नजर आने वाले प्रधानसेवक ने जनता के समक्ष तो अपनी सेवकाई सिद्ध कर दी, किंतु विकलांगजनों को अब तक सेवाएं मिल नहीं पाई है। दशा यह है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में एक पूंजीपति अपनी ताकत का इस्तेमाल करके पूर्वांचल का सबसे बड़ा अन्धविद्यालय बिना किसी पूर्व सूचना के बंद कर रहा है और उसके खिलाफ एक भी शिकायत, अफसर से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री तक कोई नही सुनता। ये दिखाता है कि आज सरकार प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बल्कि पूंजीपति चला रहे हैं। इनका जो मन करता है वो करते हैं।
पूरे उत्तर प्रदेश में तकरीबन 18 लाख दृष्टिबाधित जनसंख्या है जबकि उसकी अपेक्षा उनके स्कूलों की संख्या काफी कम है। कहाँ तो स्कूल बढ़ाए जाने चाहिए थे और कहाँ पूंजीपतियों की भूख इतनी बढ़ गई है कि उनकी भूख शांत करने के लिए दिव्यांगों के स्कूल बंद किए जा रहे हैं और सरकारें मूकदर्शक बन कर तमाशा देख रही है।

वर्ष 1972 में बनकर तैयार हुआ था यह अंध विद्यालय
बनारस के दुर्गाकुंड स्थित श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंधविद्यालय (Sri Hanuman Prashad Poddar Andh Vidyalay) है, जो श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार सेवा समिति ट्रस्ट द्वारा संचालित होता है। इसके सर्वेसवी बनारस के प्रसिद्ध पूंजीपति किशन जालान है। यह विद्यालय 1972 में बन करके तैयार हुआ और 1984/92 में क्रमश: इसे दसवीं और बारहवीं की सरकारी मान्यता भी प्राप्त हुई। यह पूर्वांचल का सबसे बड़ा अन्धविद्यालय है, यहां 250 विद्यार्थियों के पठन पाठन की आवासीय व्यवस्था है। केवल उत्तरप्रदेश ही नही बल्कि बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, असम आदि राज्यों से भी दृष्टिहीन छात्र यहां पढ़ने आतें है।
ट्रस्ट का फैसला है कि अब इस विद्यालय को नवीं से बारहवीं कक्षा तक बंद कर देना चाहिए। आपको जानकर आश्चर्य होगा, कि विकलांगों को दिव्यांग कहे जाने वाले इस महान भारत में एक भी केंद्रशासित अंधविद्यालय नहीं है। उत्तरप्रदेश में 100 या 150 छात्रों के लिए राजकीय स्तर पर लड़कों के केवल चार और लड़कियों के लिए केवल 3 अन्धविद्यालय है। इस परिस्तिथि में जब इस तरह के विशेष विद्यालयों का सर्वथा अभाव है। प्रधानमंत्री के शहर में एक ऐसे अन्धविद्यालय का बंद किया जाना जिसे सरकारी अनुदान भी प्राप्त होता है, अत्यंत निंदनीय है। अन्धविद्यालय को सरकार द्वारा अनुदान भी प्राप्त होता है। पहले 75 प्रतिशत अनुदान प्राप्त होता था लेकिन सरकार द्वारा विकलांगों को दिव्यांग कहे जाने के बाद 2014 से यह अनुदान कट कर 50₹ हो गया और 2019-20 में सरकार से अनुदान भी बंद हो गया।
जनता की आस्था का इस्तेमाल दृष्टिहीनता पर किये जाने के कारण दानदाताओं का भी तांता लगा रहता है। मगर छात्र के जीवन इन सुविधाओं का कोई असर नहीं पड़ता। इन पैसों और सुविधाओं का यह ट्रस्ट अपने व्यवसायिक कामों में करती है। यहां तक कि दानदाताओं को आकर्षित करने के लिए परीक्षा के दिनों में भी विद्यालय प्रांगण में ही कथाओं और बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनका कोई भी सार्थक प्रयास हम दृष्टिहीनों पर नहीं पड़ता। विद्यालय प्रशासन व ट्रस्ट को न ती विकलांगता के बारे में कोई वैज्ञानिक समझ है और नही संवेदनशील जिसकी वजह से हम दृष्टीहीन
छात्रों का निरंतर शारिरिक और मानसिक शोषण होता है।

विकलांगों के मूल अधिकार दबाने में जुटी सरकार और सामाजिक संस्थाएं
21 वीं सदी का विश्व जहां विकलांगजनों को अपना जीवन स्वाभिमान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीने के लिए प्रेरित कर रहा है वहीं हमारे देश में सरकार और सामाजिक संस्थाएं विकलांगों के मूल अधिकार दबाकर हमारे साथ मजाक कर रही है।
इस मुश्किल परिस्थिति में इतने संवेदनशील विषय पर इस्ट और सरकार के विकलांगों के प्रति किये जाने वाले का विकलांग अधिकार संघर्ष समिति घोर निंदा करती है। हमने एक साल तक कोशिश की, जिला अधिकारी से लेकर मोदीजी तक अपनी समस्या पहुंचाई, मगर हम छात्रों को अपनी इस प्रक्रिया का कोई असर कभी नजर नहीं आया।
एक तरफ ट्रस्ट आर्थिक तंगी का हवाला दे रहा है और दूसरी ओर सरकारी मशीने कागजात वक्त पर न भेजने की बात बता रही है। छात्रों का कहना है कि इस अंधविद्यालय को सरकार पूर्णतया अपने अधिकार क्षेत्र में ले और हमें हमारा अधिकार भीख या सेवा के बजाय अधिकार के साथ प्रदान किया जाए। विद्यालय से निकाले गए छात्रों को वापस दाखिल किया जाए और उनकी कक्षाओं और परीक्षाओं का उचित प्रबंध किया जाए। तत्काल प्रभाव से विद्यालय को पुनः संचालित किया जाए।
हम दिव्यांग तो नहीं जानते कि सरकार और ट्रस्ट के बीच क्या खिचड़ी पक रही है लेकिन हम इतना जरूर जानते हैं कि अगर ये विद्यालय बंद हुआ तो इससे सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि बिहार, झारखंड और तमाम अन्य राज्यों के दिव्यांग प्रभावित होंगे, उनका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। कोई भी दिव्यांग शारीरिक श्रम करके अपना जीवनयापन नहीं खरीद सकता। उसके पास शिक्षा ही एकमात्र पूजी है। यदि उनसे वो भी छीन लिया जाएगा तो सरकार और ट्रस्ट उनको उस अंधेरे में धकेल रहा है जहां उनकी आने वाली पीड़ियों का भी भविष्य अंधकारमय होगा और इसकी पूरी-पूरी जिम्मेदार पूंजीपतियों के हाथों बिक चुकी प्रदेश और केंद्र सरकार होगी।

दृष्टिबाधितों के ऐतिहासिक विद्यालय पर अवैध कब्जे की योजना में पूंजीपति जालान समूह ने हमारे विरोध के लिए स्थानीय दुकानदारों को आगे कर दिया है, जो कि विद्यालय के जमीन पर ही काबिज सालों से दुकान चला रहे है। हमें दिखता नहीं पर हमको हमारे विद्यालय ने ही पाला है, समाज में खड़ा किया है, ये हमारी मातृ मंदिर है जहां कोई 12 साल ,10 साल तो किसी ने 6 साल पढ़कर देश में अपना स्थान बनाया है।
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बताते चलें कि श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय (Sri Hanuman Prashad Poddar Andh Vidyalay) सन 1972 से गायत्री बाजोरिया की संपत्ति सहित काशी नरेश के समर्थन से इस हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय (Sri Hanuman Prashad Poddar Andh Vidyalay) की नींव डाली गई थी। जो भी खरीद फरोख्त की बात झूठ है, जालान समूह के मुखिया दिन दयाल जालान की मृत्यु के पूर्व जो जमीन ट्रस्ट को दान दे दी गई थी। साल 2 साल पहले अचानक उसका भूत जागना विद्यालय को मॉल बनाने की योजना मूर्त रूप दी जा रही है। अथक प्रयास के बाद इस विद्यालय से निकली प्रतिभाओं ने देश का नाम रौशन किया है, जो धीरे-धीरे भारत की दूसरी बड़ी ब्रेन लाइब्रेरी बन गया। ब्रेन लिपि अंधे छात्रों के लिए क्रांति की शुरुआत थी। जो आज इस अंध विद्यालय को नोटों की भेंट चढ़ा रहे है, और एक आम आदमी एवम सरकार के अमानवीय तंत्र के सभी पदाधिकारी कमजोरों के दमन में लगे अंधे, बहरे, गूंगे, लाचार पंगु और लकवा ग्रस्त नजर आते है।
लगातार 45 दिनों से जारी है विकलांग छात्रों का अनशन, सरकार व प्रशासन बेसुध
मात्र सोचिए! 45 दिनों से भीषण गर्मी में विद्यालय बचाने के लिए प्लास्टिक के नीचे रहना, सोना अधिकार का काशी का ऐतिहासिक अनशन कहा जायेगा। जहां मां दुर्गा दर्शन करने वालों के पैसे से ये खाना खा रहे थे। अनशन के 45वें दिन इन अंन्धो को येन केन हटाने प्रयास देर रात तक चलता रहा, जो आखिरी अपडेट मिला परंतु 10/15 विकलांग छात्रों के लिए 200/300 संख्या बल लगाकर जब भी ये आंदोलन तोड़ा जायेगा वो दिन काशी के इतिहास को काला कर जायेगा। प्रशासन के आला अधिकारी न चाहते हुए भी अल्टीमेटम इन दृष्टिबाधितों को दे रहे है न कि कब्जा करने वाले के दस्तावेज से अधिकार से पुष्टि कर न्याय की सोचते है।




