Caste Census: 2011 की जनगणना में सामने आए सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के आंकड़े नहीं होंगे सार्वजनिक, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

<p><strong>Supreme Court on Caste Census:</strong> साल 2011 की जनगणना में सामने आए सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार की दलील स्वीकार कर ली. केंद्र ने कहा था कि 2011 में ओबीसी की संख्या जानने के लिए जातिगत जनगणना नहीं हुई थी. परिवारों का पिछड़ापन जानने के लिए सर्वे हुआ था. लेकिन वह आंकड़ा त्रुटिपूर्ण है, इस्तेमाल करने लायक नहीं है. महाराष्ट्र सरकार ने स्थानीय चुनाव में ओबीसी आरक्षण देने के लिए यह आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया.&nbsp;</p> <p>सरकार ने मंगलवार को कहा था कि वह ओबीसी के लिए आरक्षण का "पूरी तरह से समर्थन" करती है, लेकिन यह कवायद संविधान पीठ के फैसले के मुताबिक होनी चाहिए, जिसमें राज्य के भीतर स्थानीय निकायों के संबंध में पिछड़ेपन के नेचर और जटिलताओं की कड़ी जांच करने के लिए एक समर्पित आयोग की स्थापना सहित तीन शर्तों की बात कही गई थी.</p> <p>शीर्ष अदालत महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें केंद्र और अन्य अधिकारियों को राज्य को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के एसईसीसी 2011 के कच्चे जातिगत आंकड़े उपलब्ध कराने का निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया गया था. याचिका में कहा गया है कि बार-बार मांग किए जाने के बावजूद राज्य को संबंधित आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया.</p> <p>केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस सी टी रविकुमार की बेंच से कहा था कि न केवल आरक्षण के लिए बल्कि रोजगार, शिक्षा और अन्य के लिए भी एसईसीसी 2011 पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा, मैंने यह भी बताया है कि यह विश्वसनीय क्यों नहीं है. यह एक अलग मकसद के लिए लिया गया था और जिन कारणों को लेकर गणना की गई थी, उन्हें त्रुटिपूर्ण पाया गया था.</p> <p><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/XKt29vOFpUA" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>

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Team My Nation News
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