- COVID-19 Coronavirus के आगे सुपर पावर कहे जाने वाले देशों ने भी अपने घुटने टेक दिए
- Lockdown 4.0 के दौरान क्या पहले की खामियों को दूर किया जायेगा या सब कुछ पुराने ढर्रों के अमरूप ही होगा
विश्लेषक: सुभाष चंद्रा
साल 2020, शुरुआत होती है एक ऐसी वैश्विक महामारी जो चीन से शुरू हुई और देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया जिसे बाद में नाम दिया गया COVID-19 Coronavirus.
2019 के अंत और शुरुआती 2020 तक यह किसी को भी नहीं पता था कि चीन जिस अदृशय बीमारी से जूझ रहा है वह बहुत जल्द ही एक महामारी का रूप लेने वाली थी। इससे पहले कोई कुछ समझ पता स्तिथियाँ हाथों से निकलती चली गयीं और फिर मार्च आते आते यह पूरी दुनिया में फैल गयी।
संसार की सुपर पावर कहे जाने वाले देशों ने COVID-19 Coronavirus के आगेअपने घुटने टेक दिए और मई आते आते पूरी दुनिया में करीब 40 लाख लोग संक्रमित हो चुके थे। ढाई लाख से अधिक लोग अपनी जान गवां चुके थे। पूरी दुनिया की आधी से ज्यादा जनसख्या LOCKDOWN के नाम पर अपने आप को घरों में कैद कर चुकी थी।
COVID-19 Coronavirus के चलते स्कूल, कालेज, फैक्ट्री, ऑफिस, मिल, सब बंद हो चुके थे, सड़कें वीरान थी, रेल और हवाई यातायात ठप्प पड़ा था, सिर्फ जरुरी समान की आवाजाही थी। इस तरह का माहौल शायद ही किसी ने अपने जीवनकाल में देखा या महसूस किया हो।
जो देश कल तक किसी के सपनो की मंज़िल हुआ करते थे आज इस वायरस ने सबकी पोल खोल दी। परमाणु हथियारों से सुसज्जित देश आज एक अनदेखे शत्रु के सामने असहाय खड़े थे, लाचार थे। बेहतरीन से बेहतरीन चिकित्सा सुविधाओं के होते हुए भी वह चाह कर भी अपने देश में मौतों का आंकड़ा रोक नहीं पा रहे थे।
भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो COVID-19 Coronavirus हमारे लिये समस्या बहुत गंभीर थी, भारत जैसे विकाशील और घनी आबादी वाले देश में अगर समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो परिस्तिथियाँ भयानक से भयावह हो सकती थी। देश के प्रधानमत्री के कंधो पर एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी थी, खासतौर पर उन हालातों में जब देश में चिकित्सा सुविधाओं का आभाव हो तो ज़ाहिर है खतरा बहुत गंभीर है और गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी।
पर फैसला तो लेना था, आज नहीं तो कल और कल का इंतज़ार करते तो शायद बहुत देर हो जाती और फिर भी फैसला वही लिया जाना था जो प्रधानमत्री आज लेने की सोच रहे थे और फिर वो फैसला लिया गया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। एक दिन का जनता कर्फ्यू और फिर उसके बाद पुरे देश में 21 दिन का Lockdown. योजना थी संक्रमण को रोकना, जो जहाँ था वो वही पर रहे, किसी के मिलने जुलने पर रोक लगा दी गयी, सरकार की मंशा थी कि जितना हो सके Social Distancing के जरिये संक्रमण को रोका जाये और सरकार इसमें कामयाब भी हुई
यह एक ऐसा फैसला था जिसे शुरुआती दौर में ही लेने में हर देश कतरा रहा था, कारण था देश की अर्थव्यवस्था और सोचना भी सही था।
परन्तु हमारे प्रधानमंत्री ने इन सब को परे रख कर पुरे देश में lockdown का वो कठिन फैसला लिया और एक के बाद दूसरा फिर तीसरा और चौथा lockdown, किसी भी देश के अर्थव्यवस्था को दो महीने से भी जयादा समय तक बंद रखना यह अपने आप में ही एक बहुत बड़ा फैसला था। देश की हर राजनीतिक पार्टी ने अपने राजनीति के स्तर से उठ कर प्रधानमंत्री के फैसले का स्वागत किया।
देश की अर्थव्यवस्था लगातार घटती जा रही थी, परन्तु खतरा अभी भी बरक़रार था। तीसरा चरण आते-आते थोड़ी रियायतों के साथ अर्थवयवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशेँ की जाने लगी। अर्सों से पड़ी फैक्टरियों, कारखानों व सामाजिक दुकानों को खोलने की अनुमति दी गयी।
सरकार हर मोर्चे डटी रही और हर संभव से संभव कोशिश करती रही, कभी विनती से तो कभी सख्ती से।
देश की चरमराती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। पहले 65,000.00 हज़ार करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा और फिर 2 लाख करोड़ का एक और राहत पैकेज।
इस बीच समूचे देश में प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी था, किसी साधन के आभाव में वे सब पैदल ही अपने अपने गंतव्यों की ओर चल पड़े। इससे तो खतरा और भी बढ़ जाता। इसी मद्देनज़र रखते हुए प्रवासी मजदूरों को अपने गावों व शहरों में पहुंचाने के लिए सड़क व रेल यातायात को आंशिक रूप से शुरू किया गया। परन्तु इसके बावजुद भी देशभर से मजदूरों के पलायन की घटनाएं चिंता को और भी बढ़ाती रहीं। पर भारत जैसे विशाल देश में भीड़ को नियंत्रित करना बहुत ही कठिन कार्य है।
यहाँ पर एक सवाल यह खड़ा होता है कि अगर हर प्रवासी मजदूर वापस अपने गाँव या शहर चला जायेगा तो जब स्थितियां सामान्य होनी शुरू होंगी तब फैक्ट्रियों में, कारखानों में, मिलों में काम करने के लिए मजदूरों की वयवस्था कहाँ से होगी ? चंद मुठ्ठीभर कामगारों के साथ उत्पादक क्षमता को कैसे बढ़ाया जायेगा और वो उस समय में जब हम ये नहीं जानते कि परिस्थितियां कब तक सामान्य होंगी और जब तक सामान्य नहीं हो जाती है तब तक किसी भी उद्योग में शत प्रतिशत कार्य क्षमता को अमल में नहीं लाया जा सकता।
क्या सरकारों का यह दायित्व नहीं है कि देश की औद्योगिक इकाईयों को देखते हुए जो जहाँ है उसे वही पर की निति पर कोई योजना बनाती ? उन्हें वो खाने-पाने की हर चीज मुहैया कराती ताकि स्तिथियाँ सामान्य होने पर एक तो उस क्षेत्र में किसी भी औद्योगिक इकाई में मजदूरों की कमी ना हो और दूसरा संक्रमण के खतरे को अधिक से अधिक रोका जा सकें। हलाकि कुछेक सरकारों ने इस ओर कुछ कदम बढ़ाये भी परन्तु बाद में तंत्र की खामियों हवाला देते हुये मजदूरों को वापस भेजने का निर्णय ले लिया जोकि बाद में एक गलत निर्णय में तब्दील हो सकता हैं।
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