
<p style="text-align: justify;"><strong>Firecrackers Ban:</strong> पश्चिम बंगाल में पटाखों पर पूरी तरह रोक का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है. कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहां है कि उसने पूरे देश में ग्रीन पटाखों को अनुमति दी है. इससे अलग इतना सख्त आदेश देने के लिए हाई कोर्ट के पास कोई बड़ी वजह होनी चाहिए थी, जो कि दिखाई नहीं पड़ रही है.</p> <p style="text-align: justify;">29 अक्टूबर को कलकत्ता हाई कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता रोशनी अली की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य में हर तरह के पटाखों के उत्पादन, बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगा दी. हाई कोर्ट ने कहा था कि सड़कों पर बिक रहे और इस्तेमाल किए जा रहे हैं पटाखों में प्रतिबंधित सामग्री का इस्तेमाल हुआ है या नहीं, यह पता लगा पाना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है. इसलिए हर तरह के पटाखों पर लगाना ही बेहतर है. इसका विरोध करते हुए पश्चिम बंगाल के पटाखा कारोबारियों की संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि वह कोर्ट के पुराने आदेशों के मुताबिक सिर्फ ग्रीन पटाखे की बिक्री कर रहे हैं. हाई कोर्ट ने पूरी रोक लगा कर इस व्यापार से जुड़े 7 लाख लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है.</p> <p style="text-align: justify;">पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने भी याचिकाकर्ताओं की दलील का समर्थन किया ग्रोवर ने कहा, "हाई कोर्ट का यह मान लेना कि राज्य सरकार का प्रशासनिक अमला प्रतिबंधित पटाखों की पहचान और उनकी रोकथाम में सक्षम नहीं, पूरी तरह गलत है. हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस पहलू पर हमसे सवाल भी नहीं किया. फिर भी हाई कोर्ट ने यह खुद ही मान लिया कि प्रतिबंधित पटाखों की पहचान संभव नहीं है." ग्रोवर ने कहा कि सभी पटाखों में क्यूआर कोड होता है, जिसके माध्यम से प्रशासन के लोग तुरंत उसकी पहचान कर सकते हैं. पिछले 3 सालों में राज्य की पुलिस ने प्रतिबंधित पटाखा बेचने वाले कई लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए और उन्हें गिरफ्तार भी किया है.</p> <p style="text-align: justify;">दिवाली की छुट्टी के दौरान सुनवाई के लिए विशेष रूप से बैठी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएम खानविलकर और अजय रस्तोगी की बेंच ने राज्य सरकार की दलीलों को नोट किया. जजों ने कहा कि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कई आदेश जारी किए जा चुके हैं. कुछ आदेश नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पारित किए हैं. उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है. ऐसे में इन आदेशों से अलग इतना सख्त आदेश देने से पहले हाई कोर्ट को सभी पहलुओं को विस्तार है देखना चाहिए था. हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से यह पूछा तक नहीं कि वह प्रतिबंधित पटाखों की रोकथाम कर सकती है या नहीं. इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया.</p> <p style="text-align: justify;">जजों ने इस बात पर हैरानी जताई है हाई कोर्ट ने अपने आदेश में जिन व्यावहारिक पहलुओं की बात की है, आखिर वह कौन से पहलू हैं, जिन्हें न तो याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में रखा, न ही जिन पर राज्य सरकार से सवाल पूछे गए. हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाली रोशनी अली के वकील रचित लखमनी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में दिवाली के बाद से भाई दूज, काली पूजा, छठ आदि त्योहारों के चलते करीब 1 महीने तक उत्सव का माहौल रहता है. इस दौरान प्रदूषण बहुत बढ़ सकता है. जजों ने उन्हें रोकते हुए कहा, "यह पुराने आदेश में साफ किया जा चुका है कि अगर प्रदूषण का स्तर अधिक बढ़ जाए, तो प्रशासन की बिक्री पर रोक लगा सकता है. त्यौहार से पहले ही रोक लगा देना सही नहीं."</p> <p style="text-align: justify;">राज्य में पटाखों की बिक्री पर रोक का समर्थन कर रहे वकील ने कहा कि अगर पटाखे चलाने की अनुमति दी गई तो लोग उन्हें हॉस्पिटल के बाहर चलाएंगे. तय समय सीमा के परे भी चलाएंगे. इस पर जजों ने कहा, "यह सब पहलू भी हमारे पुराने आदेशों में देखे जा चुके हैं. आप बहुत ज्यादा कल्पना कर रहे हैं. समाज में कुछ लोग गलती करेंगे, इसकी आशंका जताते हुए पटाखों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती है." जजों ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता के पास कुछ और जानकारी या आकंड़े आते हैं, तो वह दोबारा हाई कोर्ट जा सकता है. पर हाई कोर्ट सभी पक्षों को विस्तार से सुने बिना कोई आदेश न दे.</p>
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