- लॉकडाउन के पहले 40 दिनों में देश के 12.2 करोड़ लोग नौकरी गवां चुके हैं
- देश का बेरोजगार युवा आत्महत्या करने या अपराध में संलिप्त होने को मजबूर हो रहा है
लखनऊ से संचयिता चतुर्वेदी की विशेष रिपोर्ट
दुनिया में अपनी विविधताओं के लिए जाना जाने वाला भारत देश पिछले कुछ वर्षों में एक नयी शक्ति बनकर उभरा है जिसका सबसे बड़ा श्रेया भारत की युवा पीढ़ी को ही जाता है। आजाद भारत ने इतने वर्षों में जाने कितनी ही विपत्तियों को न सिर्फ देखा बल्कि हर विपत्ति पर विजय प्राप्त करते हुए विकास के पथ पर आगे भी बढ़ा। युवा वर्ग को अगर हम किसी विकासशील देश के लिए रीढ़ की हड्डी की संज्ञा दें तो यह कत्तई भी अतिश्योक्ति न होगा। लेकिन अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने वाला युवा वर्ग वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं रोजगार अवसरों को लेकर उलझा हुआ है। सीएमआईई के हालिया सर्वे से पता चला है कि देश में लॉकडाउन के सिर्फ पहले 40 दिनों में ही 12.2 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गवां चुके हैं। मौजूदा समय की बात करें तो कोरोनावायरस और लॉकडाउन के चलते जिस तरह से देश में बेरोजगारी बढ़ी है उसका सबसे बड़ा असर युवा वर्ग पर ही पड़ा है हालांकि पीएम मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पॅकेज की घोषणा कर अर्थव्यवस्था और उद्योगों को आगे बढ़ने की पहल जरूर की है पर यह कितना कारगर होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ी बेरोजगारी की बात करें तो यह लॉकडाउन होने के बहुत पहले से है। सरकार ने कोरोना वायरस के चलते 22 मार्च से लॉकडाउन किया और देश भर में उद्योग बंद हुए लेकिन पिछले कुछ सालों से देश में ऑटोमोबाइल, एविएशन, रियल इस्टेट, कंस्ट्रक्शन आदि कुछ सेक्टर्स का बुरा हाल था और इन सेक्टर्स में लॉकडाउन के बहुत पहले से ही जाने कितने लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाईं हैं। लॉकडाउन ने देश में बढ़ रहे इस बेरोजगारी के आंकड़े में ‘नीम चढ़े करेले’ वाली कहावत का काम किया है।
दरअसल ये बेरोजगारी का कोढ़ अंदर ही अंदर देश को खोखला बना रहा है। आज जब विश्व स्तर पर हम आर्थिक मंदी का सामना कर रहे हैं, तो युवा वर्ग मात्र इस उलझन में है कि अब जॉब अवसर और कम होंगे। जिन युवाओं के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाए बैठे हैं, उसकी नींव की हालत निराशाजनक है और हमारी नीतियों के खोखलेपन को राष्ट्रीय पटल पर प्रदर्शित कर रही है। जिस युवा शक्ति के दम पर हम विश्व भर में इतराते फिरते हैं। देश की वही युवा शक्ति एक अदद नौकरी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी के कारण सबसे अधिक आत्महत्याओं का कलंक भी हमारे देश के माथे पर लगा हुआ है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड के ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्रतिदिन युवा खुद को काल के गाल में झोंक रहे हैं और इस संताप की स्थिति का जन्म छात्र बेरोजगारी की गंभीर समस्या के कारण हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, भारत सरकार और विभिन्न एजेंसियों के ताजा सर्वेक्षण और रपट इस ओर इशारा करते हैं कि देश में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है। जिन युवाओं के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाए बैठे हैं। उसकी नींव की हालत निराशाजनक है, और हमारी नीतियों के खोखलेपन को राष्ट्रीय पटल पर प्रदर्शित कर रही है। आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। इस समय देश की बड़ी आबादी बेरोजगार है। यह वे लोग हैं जो काम करने लायक हैं, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं हैं। इस प्रतिशत को अगर संख्या में देखें, तो पता चलता है कि देश के लगभग 12 करोड़ लोग बेराजगार हैं। मोदी सरकार के श्रम मंत्रालय के श्रम ब्यूरो के सर्वे से भी सामने आया है कि बेरोजगारी दर पिछले पांच साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। आंकड़ों के अनुसार हर रोज नौकरियां कम हुई हैं और स्वरोजगार के मौके घटे हैं। इन सारी कवायदों के बीच जो आंकड़े आमने आए हैं, उनसे पता चलता है कि रोजगार के मुद्दे पर देश के हालात बहुत खराब हैं। हाल ही में आई अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आने वाले कुछ सालों में देश के तीन चैथाई कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स पर नौकरी का खतरा मंडराने लगेगा या फिर उन्हें उनकी काबिलियत के मुताबिक काम नहीं मिलेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में भारत में जो काम करने वाले लोग हैं, उनमें से करोडो लोगों को उनकी योग्यता के हिसाब से न तो काम मिलेगा, न नौकरी। इसके अलावा इन पर नौकरी जाने का खतरा भी मंडरा रहा है। एक सर्वे के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के मोर्चे पर तो हालत और खराब है। रिपोर्ट कहती है कि बीते चार साल में महिलाओं की बेरोजगारी दर 8.7 तक पहुंच गई है। नौकरियां कम हुई हैं यह देश का एक ऐसा सच है जिससे राजनीतिकों, नीति-नियंताओं तथा खुद को मुल्क का रहनुमा समझने वाले लोगों ने आंखें मूंद ली हैं। इक्कीसवीं सदी की बात करें लगभग 1,54,751 बेरोजगार अब तक खुदकुशी कर चुके हैं। ये नेट से मिली ऑनलाइन जानकारी मात्र है। इस तरह युवाओं का बेदम होना किसी राष्ट्र के बेदम होने का संकेत ही है।
बेरोजगारी की समस्या वर्ष दर वर्ष और गंभीर होती जा रही है तो क्या मान लिया जाए की भारत बढ़ती खुदकुशियों के एक नए कीर्तिमान की ओर अग्रसर हो रहा है? सरकारी क्षेत्र में रोजगार हासिल करने के लिए बेरोजगार युवाओं को आज कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। लाखों बेरोजगार युवाओं को आवेदन करने के एवज में आवश्यकता से अधिक आवेदन राशि देनी पड़ रही है। आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए इस बेरोजगार युग में रुपए जुटाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार द्वारा की जाने वाली भर्तियों में पदों की संख्या बेरोजगारों की भीड़ को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। इसके बावजूद लाखों युवाओं द्वारा दिया गया आवेदन शुल्क सरकार के खजाने में जमा हो जाता है। देश में बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पढ़े-लिखे लोगों मे बेरोजगारी के हालात ये हैं, कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के पद के लिए प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं। रोजगार के मोर्चे पर हालात विस्फोटक होते जा रहे हैं। सरकार को चाहिए कि इस मसले पर वह गंभीरता से विचार करे। घोषित तौर पर सरकारी योजनाएं बहुत हैं, मगर क्या उन पर ईमानदारी से अमल हो पाता है? इसकी जांच करने वाला कोई नहीं, करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करने से कुछ नहीं होगा, जब तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस नतीजा नहीं सामने आता।
देश में बेरोजगारी की दर कम किए बिना विकास का दावा करना कभी भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। देश का शिक्षित बेरोजगार युवा आज स्थायी रोजगार की तलाश में है। ऐसे में बमुश्किल किसी निजी संस्थान में अस्थायी नौकरी मिलना भविष्य में नौकरी की सुरक्षा के लिए लिहाज से एक बड़ा खतरा है। सरकार द्वारा सरकारी महकमों को पीपीपी स्वरूप में तब्दील कर देने और खुद अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हटने को लेकर शक बढ़ता है, कि सरकार क्या करने वाली है। यह सब मिल कर सेवा क्षेत्र में बढ़ती जीडीपी पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना को दर्शाता है। सरकार को देश के सेवा क्षेत्र में नए प्रयोग करने के साथ-साथ उसमें विस्तार करने की जरूरत है, ताकि नए पद सृजित किए जा सकें। नए सरकारी पद सृजित होंगे तो युवाओं को रोजगार मिलेगा। इससे देश की विकास दर रफ्तार पकड़ेगी. आज कृषि, प्रशासन, बैंक, बीमा, चिकित्सा, शिक्षा, रक्षा, साइबर सुरक्षा, तकनीकी और अनुसंधान क्षेत्रों में नए पदों पर भर्तियों की आवश्यकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह समझ बखूबी है, और इसी का फायदा उठाते हुए वे कर्मचारियों का शोषण कर रही हैं। कम तनख्वाह में व्यक्ति काम करने के लिए तभी तैयार होता है, जब उसको कहीं और काम मिलने में दिक्कत हो। इसी का फायदा आज निजी कंपनियां उठा रही हैं, और लोगों की तनख्वाह लगातार कम होती जा रही है।
बेरोजगार युवाओं के तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है,और मोदी की सरकार को तुरंत इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र व राज्य सरकारें भारी तादाद में रोजगार देने वाले उद्योग नयी नौकरियां पैदा करने में नाकाम रही हैं। इस समस्या के समाधान के लिए कौशल विकास और लघु उद्योग को बढ़ावा देना जरूरी है। वहीं युवाओं को नौकरी के लायक बनाने के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग के जरिये कौशल विकास बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उद्योग व तकनीक संस्थान में बेहतर तालमेल जरूरी है। सवाल यह भी है कि इन हालातों में आखिर देश के युवा कहां जाएं, क्या करें, जब उनके पास रोजगार के लिए मौके नहीं हैं, समुचित संसाधन नहीं हैं, योजनाए सिर्फ कागजों में सीमित हैं। पहले ही नौकरियों में खाली पदों पर भर्ती पर लगभग रोक लगी हुई है, उस पर बढ़ती बेरोजगारी आग में घी का काम कर रही है। पढ़े-लिखे लोगों की डिग्रियां आज रद्दी हो गई हैं, क्योंकि उन्हें रोजगार नहीं मिलता। सरकार को इस मसले को गंभीरता से लेना चाहिए। नए रोजगारों का सृजन करना जरूरी है। युवा देश का भविष्य है तो वह भविष्य क्यों अधर में लटका रहे? मोदी सरकार ने कौशल विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किये थे, लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिदिन 500 नए रोजगारों का सृजन किया जाता है। यह हमारी बेलगाम रफ्तार से बढ़ती आबादी के लिहाज से ऊंट के मुंह में जीरा ही कहा जा सकता है। इसके मद्देनजर हमारी योजनाओं की प्राथमिकताओं में बेरोजगारी को शामिल कर मजबूत कदम जरूर उठाने चाहिए वरना यही बेरोजगारी विष बनकर देश की अर्थव्यवस्था को पीछे करती जाएगी और इसका सबसे बड़ा शिकार देश का युवा वर्ग ही होगा।
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