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OTT प्लेटफॉर्म के नाम पर देश में बढ़ती जा रही पॉर्नोग्राफी, धड़ल्ले से पोर्न दिखा रहे इन इंडियन ऐप्स से बेखबर सरकार व पुलिस

OTT प्लेटफॉर्म पर मौजूद इन पॉर्न दिखाने वाले ऐप्लिकेशनों पर सरकार व सम्बंधित विभागों की नजर भी नहीं पड़ी, जबकि इन ऐप्लिकेशनों के सोशल मीडिया एकाउंट पर लाखों की संख्या में फॉलोवर हैं, और इसके संचालक इन सोशल मीडिया एकाउंट के जरिये ही छोटी-छोटी क्लिप व फोटो डालकर पॉर्न फिल्मों को प्रमोट कर करोड़ों रुपये की उगाही कर रहे हैं

रिपोर्ट: मयंक शुक्ला

देश में OTT प्लेटफॉर्म पर फिल्मों और टीवी की तरह सेंसरशिप की मांग लगातार उठ रही है। अश्लीलता को प्रतिबंधित करने के लिए OTT प्लेटफॉर्म पर मौजूद महज कुछ ऐप्स जैसे ALT BALAJI, PRIME VIDEO, HOTSTAR, NETFLIX, ZEE5 और MX PLAYER का हवाला दिया जा रहा है। ये तो अश्लीलता परोसने वाले महज कुछ ऐप्लिकेशन हैं जिनके कंटेंट में कहीं-कहीं अश्लीलता और बहुताधिक में अपशब्द भरे होते हैं, हालांकि इन एप्लिकेशन पर मौजूद कंटेंट को पॉर्न नहीं कहा जा सकता है। लेकिन इस वक़्त देश में OTT प्लेटफॉर्म के नाम पर पॉर्नोग्राफी दिखाने वाले ऐप धड़ल्ले से लगातार बढ़ते जा रहे हैं और इनकी उपलब्धता भी काफी आसान होने से इनका यह अवैध व्यवसाय काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है।

माईनेशन न्यूज़ की टीम ने ऐसे बहुत से ऐप्लिकेशन की खोज की और मामले की तह तक पड़ताल की। ये OTT प्लेटफॉर्म वाले मोबाइल एप्लीकेशन प्ले-स्टोर व अन्य ऐप स्टोरों से मोबाइल पर धड़ल्ले से डाउनलोड किये जा रहे हैं। और इन ऐप्स पर मौजूद कंटेंट पर न तो सरकार की नजर है और न ही पुलिस को कोई जानकारी है। FLIZZ MOVIES, HOTSHOTS DIGITAL, BANANA PRIME, THE CINEMA DOSTI, FENEO MOVIES, MAUZI FILMS, BOLTI KAHANI, GUPCHUP, EIGHT SHOTS, CHIKOO FLIX और न जाने कितनई ऐसी ऐप्स पिछले कुछ समय के अंदर काफी तेजी से बढ़ी हैं जो खुलेआम अपने प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज़ के नाम पर पॉर्नोग्राफी चला रहे हैं और सरकार से लेकर पुलिस को खबर तक नहीं है।

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इन ऐप्स के सौदागर बॉलीवुड की बी और सी ग्रेड की अभिनेत्रियों को लेकर वेब-सीरीज़ के नाम पर न्यूडिटी और पॉर्न बना रहे हैं। बावजूद इसके इन पॉर्न-माफियाओं के ऊपर आज तक कोई कार्रवाई की बात सामने नहीं आयी है।

OTT-अधिवक्ता वंदना कनौजिया
अधिवक्ता वंदना कनौजिया

इस मामले की गंभीरता को और डिटेल में समझने के लिए हमने हाईकोर्ट लखनऊ की अधिवक्ता वंदना कनौजिया से बातचीत की। अधिवक्ता वंदना कनौजिया ने बताया कि भारतीय संविधान की परिभाषा के संस्कृति, एकता और अखंडता तीनों ही प्रमुख शब्द हैं। देश का संविधान हमारी संस्कृति को परिभाषित करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से समाज में अश्लीलता, न्यूडिटी, अभद्रता को बढ़ावा मिला है, वह हमारी संस्कृति को परिभाषित नहीं करता है। इसे देश का एक बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की आज़ादी का नाम देता है, लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे की भी सीमा बताई गयी है। जैसे अभिव्यक्ति की आजादी आपको किसी की जान लेने या अपनी जाने देने का अधिकार नहीं देता, ठीक वैसे ही देशद्रोह, अपराध और नग्नता अभिव्यक्ति की आजादी से परे हैं।

क्या ऐसी अश्लीलता को यौन शिक्षा की परिभाषा दी जा सकती है ? इस सवाल पर अधिवक्ता ने बताया कि यौन शिक्षा और अश्लीलता में जमीन-आसमान का अंतर है। यौन शिक्षा लोगों को जागरूक बनाती है, महिला-पुरुष को समाज में बराबर का भागीदार बनाती है और समाज के बहुत से दकियानूसी और हानिकारक रीति-रिवाजों को समाप्त कराने में भी बहुत सहायक है। यह रूढ़िवादी समाज की सोच बदलने का एक जरिया है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ अश्लीलता लोगों को उत्तेजित करने व उन्हें अपराध की तरफ बढ़ने पर मजबूर करता है।

पॉर्नोग्राफी कंटेंट वाले इन ऐप्स से किस तरह का नुकसान होता है ? इस सवाल पर हाईकोर्ट लखनऊ अधिवक्ता ने बताया कि पॉर्नोग्राफी देश में पहले ही प्रतिबंधित है। और इस तरह के कंटेंट दिखाने वालों के खिलाफ सबसे पहले तो आपराधिक मुक़दमे बनते हैं। ये देश के कानून का उल्लंघन है। उसके बाद ये लोग अपने ऐप पर कई तरह से और अलग अलग अकाउंट में यूजर से सब्सक्रिप्शन के पैसे लेते हैं और कभी अपना कलेक्शन का हिसाब नहीं देते जिसके चलते मनोरंजन कर व आयकर की चोरी करके सरकार के कोष में बहुत बड़ा नुकसान करते हैं। देह व्यापर में लिप्त महिलाओं को अभिनेत्री के रूप में लेते हैं जिससे देह व्यापर को जबरन बढ़ावा मिलता है। और इस तरह के कंटेंट से रेप जैसी घटनाओं को बढ़ावा मिलता है।

OTT-मानवाधिकार कार्यकर्त्ता अभिषेक सिंह
मानवाधिकार कार्यकर्त्ता अभिषेक सिंह

OTT प्लेटफॉर्म के कंटेंट को सेंसरशिप किये जाने की लगातार मांग उठाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता अभिषेक सिंह ने माईनेशन न्यूज़ को बताया कि न्यूडिटी या अश्लीलता समाज के लिए एक अभिशाप है। हमारी संस्कृति को चोट पहुंचाने का एक जरिया है। वेबसीरीज़ के नाम पर OTT प्लेटफॉर्म पर दिखाए जा रहे अश्लील और अभद्र कंटेंट भले ही 18 वर्ष के ऊपर के लोगों के लिए हों, लेकिन इनकी उपलब्धता 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए भी बहुत आसान है। इसके अलावा अश्लील कंटेंट के कारण देश में रेप केस बढ़ रहे हैं। इनकी अभद्र भाषा और गाली-गलौच वाले डायलॉग से समाज में अभद्र भाषा का चलन बढ़ रहा है। खलनायक की भूमिका को नायक बनाकर पेश किया जाता है, नशाखोरी दिखाई जाती है और समाज में युवा वर्ग को गलत काम करने के लिए उत्तेजित किया जाता है। इसीलिए OTT प्लेटफॉर्म को सेंसरशिप किये जाने की बहुत ज़्यादा आवश्यकता है।

बता दें कि भारत में इंटरनेट की शुरुआत वर्ष 1995 में हुई थी जब देश में उच्च वर्ग के महज चंद लोग ही इंटरनेट के बारे में जानते थे। धीरे-धीरे इंटरनेट आम हाथों में पंहुचा और जून 2000 में सदन के अंदर पहली बार Information Technology (IT) Act पारित हुआ। इस ऐक्ट का मकसद डिजिटल सिगनेचर, सेक्यूरिटी और हैकिंग समेत इंटरनेट के कमर्शियल उपयोग के दायरे को सीमित कर एक लीगल स्ट्रक्चर प्रदान करना था। इस ऐक्ट के तहत अश्लील सूचनाओं या कंटेंट के पब्लिकेशन को अपराध की श्रेणी में डाला गया और अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ किसी भी परिसर में बिना वारंट छापा मारने व छानबीन करने और अभियुक्तों की गिरफ्तारी का पुलिस को अधिकार दिया गया। 2008 में हुए इस आईटी ऐक्ट के संशोधन से सरकार को इंटरनेट वेबसाइटों और कंटेंट को ब्लॉक करने का भी अधिकार मिल गया और अश्लील, अपमानजनक व भड़काऊ संदेशों व कंटेंट को अपराध की श्रेणी में ला दिया।

याद दिला दें कि वर्ष 2001 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑनलाइन पोर्नोग्राफ़ी और साइबर क्राइम से जुड़े मुद्दों पर नजर रखने के लिए एक समिति नियुक्त की थी। कोर्ट ने याचिकाकार्ताओं जयेश ठक्कर और सुनील ठाकर को साइबर लॉ पर सिफारिश करने के लिए आमंत्रित किया, जिसके बाद देश के सभी साइबर कैफे में अश्लीलता व अपराध रोकने के लिए यूज़र को आइडेंटिटी कार्ड दिखाने व जमा करने सम्बन्धी नियम चलन में आये।

इन पुरानी बातों को याद दिलाने का भी हमारा एक मकसद है। जब देश में इंटरनेट की पंहुच देश की महज छोटी सी जनसंख्या तक थी और ज्यादातर इंटरनेट यूज़र इंटरनेट का उपयोग करने साइबर कैफे में जाया करते थे, उस समय देश में आईटी ऐक्ट काफी मजबूत बन चुका था। वहीं आज जब देश में मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल लोगों की ‘बेसिक नीड’ बनता जा रहा है तो क्या ऐसे में हमारा आईटी ऐक्ट इतना छोटा पड़ गया है कि इंटरनेट के माध्यम से OTT प्लेटफॉर्म पर मौजूद इन पॉर्न दिखाने वाले ऐप्लिकेशनों पर सरकार व सम्बंधित विभागों की नजर भी नहीं पड़ी, जबकि इन ऐप्लिकेशनों के सोशल मीडिया एकाउंट पर लाखों की संख्या में फॉलोवर हैं, और इसके संचालक इन सोशल मीडिया एकाउंट के जरिये ही छोटी-छोटी क्लिप व फोटो डालकर पॉर्न फिल्मों को प्रमोट कर करोड़ों रुपये की उगाही कर रहे हैं।

फिलहाल आने वाले कुछ दिनों में इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में OTT प्लेफॉर्म पर सेंसरशिप के मामले की सुनवाई है। ऐसे में लोगों को उम्मीद है कि जिस मामले में सरकार, पुलिस और सम्बंधित विभाग हस्तक्षेप करने में असमर्थ हैं, कम से कम न्यायलय का निर्णय ही देश में इन अश्लीलता और पॉर्न परोसने वालों पर लगाम लगा सके।

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