रक्तांचल का दूसरा (Raktanchal 2) सीज़न रिलीज़ हो चुका है और इसे एमएक्स प्लेयर पर फ्री में देखा जा सकता है। हम इस वेबसीरीज़ का रिव्यू शुरू करें इसके पहले आपको बता दे कि ये पूरी कहानी असल में पूर्वांचल यानि पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो सबसे माफिया कहें या बाहुबली मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह की आपसी दुश्मनी के ही इर्द गिर्द बुनी गयी है। पहले सीज़न की कहानी जहां मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह के बीच की अस्सी के दशक की दुश्मनी पर आधारित थी तो वहीँ दूसरे सीज़न की कहानी मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, एसीपी संजीव कुमार यादव, भाजपा विधायक कृष्णानन्द राय के ऊपर बेस्ड है। इसके अलावा कहानी का एक बहुत ही इंटरेस्टिंग पहलू नब्बे के दशक में बहुजन समाजवादी पार्टी के अंदर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की मजबूत होती पकड़ को भी दिखाया गया है। हालांकि कहानी को पूरी तरह से सच नहीं कह सकते क्योंकि बहुत सारे पहलुओं को मसाला बनाने के लिए बदला भी गया है। फिर भी कहानी का चालीस फीसदी भाग रीयल लाइफ बेस्ड ही है।
जब से ओटीटी पर वेबसीरीज़ का चलन बढ़ा है, ये कहना गलत नहीं होगा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल और बिहार के माफियाओं और बाहुबलियों की लाइफ पर बेस्ड कहानियां ज्यादा ही देखने को मिल रही हैं। ज़ी फाइव पर रंगबाज का पहला सीज़न गोरखपुर माफिया श्री प्रकाश शुक्ला की रीयल लाइफ पर बेस्ड था तो वहीँ मिर्ज़ापुर भी पूर्वांचल की कहानी थी। हालांकि मिर्ज़ापुर पूरी तरह से फिक्शनल थी।
पूर्वांचल हमेशा से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबलियों और राजनीतिक माफियाओं का गढ़ रहा है। कुछ लोग रक्तांचल का दूसरा सीज़न (Raktanchal 2) देखकर कह रहे हैं कि कहानी को जबरदस्ती का राजनीतिक रुख दिया गया है या क्राइम कुछ ज्यादा ही दिखाया गया है। शायद ऐसा कहने वाले लोग पूर्वांचल की इस वर्चस्व की लड़ाई के बारे ठीक से नहीं जानते। पूर्वांचल का बच्चा-बच्चा भी इनके बारे में अच्छे से जानता है। और शायद यही वजह है कि पूर्वांचल के लोगों खासकर बनारस, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्ज़ापुर, मऊ, बलिया वालों के लिए ये वेबसीरीज़ किसी डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं है। मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह आज के समय में उत्तर प्रदेश के काफी बड़े राजनीतिक चेहरे हैं। नब्बे के दशक में मुख्तार अंसारी ने राजनीति में कदम रखा तो साल 2007 में उड़ीसा से गिरफ्तार किये गए बृजेश सिंह भी राजनीति में काफी सक्रिय हैं।
बात करते हैं इस वेबसीरीज़ के दूसरे सीज़न (Raktanchal 2) की तो कहानी शुरू होती है मुंबई से यानी साल 1992 बॉम्बे। जब बॉम्बे पुलिस की कस्टडी में अस्पताल में भर्ती तीन शातिर अपराधियों को विजय सिंह अस्पताल में ही गोलियों से भून देता है। दरअसल ये घटनाक्रम भी रीयल लाइफ बेस्ड है। क्योंकि इस दौरान ब्रजेश सिंह ने छोटा राजन के सबसे करीबी माने जाने वाले अंडरवर्ल्ड डॉन सुभाष ठाकुर से हाथ मिला लिया था। सुभाष ठाकुर दाऊद का नजदीकी था। आरोप है कि दाऊद के कहने पर ब्रजेश सिंह ने मुंबई में दिनदहाड़े जेजे हॉस्पिटल शूटआउट को अंजाम दिया था। जेजे अस्पताल में अरुण गवली गिरोह का हल्दंकर भी मारा गया था। क्योंकि ब्रजेश ग्रुप का ऐसा मानना था कि दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर के पति की हत्या में यही शामिल था। इसी शूटआउट में एक सब-इंस्पेक्टर और दो कॉन्स्टेबल भी मारे गए थे। ब्रजेश सिंह उस वक्त दाऊद इब्राहिम का शॉर्प शूटर माना जाता था। हालांकि 1993 के मुंबई बम धमाके के बाद दाउद और सुभाष ठाकुर अलग हो गए थे। वो ऐसा वक्त था जब बनारस के गैंगवार में भी एक तरफ दाउद तो दूसरी तरफ सुभाष ठाकुर का दखल दिखने लगा था।
इस हत्याकांड के बाद विजय सिंह वापस फिर से बनारस आता है और एक बार फिर से वसीम खान से बदला लेने की धुन में लग जाता है। वहीं विजय सिंह को प्रदेश के गृह मंत्री रामानंद राय का संरक्षण मिला होता है। मुंबई के सर एसजे हॉस्पिटल शूटआउट के बाद मुंबई पुलिस का एसीपी हिमांशु पटनायक इस अपराध के सूत्रधार उदय ठाकुर को अरेस्ट करता है तो अपराध को अंजाम देने वाले विजय सिंह का नाम सामने आता है। लेकिन विजय सिंह चार साल पहले वसीम खान के हाथों मारा जा चुका है इसलिए मीडिया मुंबई पुलिस का मखौल बना देती है। जिसके चलते इस पूरे मामले की छानबीन करने एसीपी हिमांशु पटनायक खुद बनारस आता है और विजय सिंह के बारे में तफ्तीश शुरू करता है।
इधर विजय सिंह अपने दुशमन वसीम खान से बदला लेने के लिए उसके ठिकानों और अवैध कामों पर कब्जा करने लगता है। जिससे परेशान होकर वसीम खान विजय सिंह के चाचा बेचन सिंह की ह्त्या करवा देता है। जिसके बाद विजय और भी बौखला जाता है।
इसी दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति भी बदल रही होती है। प्रदेश में दलितों का सपोर्ट करने वाली सरकार है और ऐसे में एक दलित परिवार के हत्याकांड में गृहमंत्री रामानंद राय का नाम सामने आने के बाद उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता है। रामानंद राय की जगह वसीम खान को प्रदेश का गृहमंत्री बना दिया जाता है। इसके बाद प्रदेश की राजनीति एक अलग ही रंग लेती है जब मुख्यमंत्री बंशीराम बहुत ज्यादा बीमार हो जाते हैं और पार्टी के तीन बड़े नेता रामानंद राय, वसीम खान और सरस्वती देवी में सीएम पद के लिए खींचतान शुरू हो जाती है। तीनों ही सीएम बनने के लिए अलग अलग राजनीतिक समीकरण जोड़ने लगते हैं।
इन सबके चलते कहानी में काफी कुछ होता है जो लोगों को एपिसोड दर एपिसोड बांधे रहता है। हालांकि इन सबमे ख़ास बात ये है कि पहला सीज़न जो की बहुत ही ज्यादा रीयल लाइफ बेस्ड था, दूसरे सीज़न के अंदर ओरिजिनल कहानी में काफी बदलाव देखने को मिलेगा।
Raktanchal 2 Acting
जहां तक ऐक्टिंग की बात की जाए तो निकितन धीर पूरी सीरीज़ (Raktanchal 2) में छाये रहे हैं। उनका हाव भाव पर्सनैलिटी काफी हद तक नब्बे के दशक वाले मुख्तार अंसारी की याद दिलाता है। वहीं क्रान्ति प्रकाश झा ने विजय सिंह के किरदार को बेहतरीन ढंग से जिया है। सरस्वती देवी बनी माही गिल नब्बे के दशक की मायावती की याद दिलाती हैं तो वहीँ करन पटेल ने एसीपी हिमांशु पटनायक के किरदार में जान डाल दी है। आशीष विद्यार्थी ने रामानंद राय के किरदार में एक बार फिर से साबित कर दिखाया है कि उनका नाम उम्दा कलाकारों की लिस्ट में क्यों शामिल किया जाता है।
Raktanchal 2 क्यों देखें
अगर आप बॉलीवुड की रीमेक और घिसी-पिटी फिल्मों से बोर हो चुके हैं और आपको रीयल लाइफ बेस्ड, या पूर्वांचल और बिहार के बाहुबलियों और माफियाओं पर बनी कहानियों में दिलचस्पी है तो ये वेबसीरीज़ आपके लिए फुल एंटरटेनमेंट है। लेकिन अगर आपको गाली गलौज और क्राइम वाली फिल्में नहीं पसंद हैं तो इस वेबसीरीज़ को न ही देखें तो बेहतर होगा।
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