- आरबीआई ने रेपो रेट में फिर कोई बदलाव नहीं किया है
- एमपीसी की बैठक के बाद गवर्नर ने की इसकी घोषणा
- मौद्रिक नीति समिति ने कायम रखा अपना तटस्थ रुख
- जीडीपी ग्रोथ रेट 6.9 फीसदी रहने का अनुमान
- इस साल महंगाई के 4.6 फीसदी रहने का अनुमान
नई दिल्ली। आरबीआई ने एक बार फिर नीतिगत ब्याज दर रेपो रेट (Repo Rate) में कोई बदलाव नहीं किया है। इसे 5.25 फीसदी पर स्थिर रखा गया है। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग में लिए गए फैसलों की जानकारी देते हुए आज यह घोषणा की। इस फाइनेंशियल ईयर में एमपीसी की यह पहली बैठक थी। साथ ही ईरान युद्ध शुरू होने के बाद यह आरबीआई की एमपीसी की पहली मीटिंग थी। मौद्रिक नीति समिति ने ‘तटस्थ’ रुख कायम रखने का फैसला किया। आरबीआई ने फरवरी में भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया था। इससे पहले 2025 में इसमें कुल मिलाकर 125 आधार अंक की कटौती की गई थी।
रेपो रेट (Repo Rate) वह दर होती है जिस पर आरबीआई बैंकों को लोन देता है। इसके कम होने से आपके होम लोन, पर्सनल लोन और कार लोन की किस्त कम होती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि आरबीआई रेपो रेट (Repo Rate) को यथावत रख सकता है। लेकिन माना जा रहा था कि पश्चिम एशिया में सीजफायर से आरबीआई गवर्नर रेट कट की चौंकाने वाली घोषणा कर सकते हैं। मगर आरबीआई की एमपीसी ने इसे यथावत रखने का फैसला किया।
आरबीआई गवर्नर ने चालू वित्त वर्ष की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया संकट से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई, लेकिन कई अन्य देशों की तुलना में भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। अर्थव्यवस्था की दिशा बताने वाले प्रमुख आंकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों की स्थिति बेहतर है।
फाइनेंशियल ईयर 2027 में रियल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.9 फीसदी रहने का अनुमान है। इस फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही में ग्रोथ रेट 6.9 फीसदी रहने का अनुमान है। दूसरी तिमाही में यह 6.8 फीसदी और तीसरी तिमाही में 6.7 फीसदी रह सकती है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इसके 7.6 फीसदी रहने का अनुमान है।
मल्होत्रा ने कहा कि हेडलाइन काबू में है और सेंट्रल बैंक के 4 फीसदी के टारगेट से नीचे है। इस फाइनेंशियल ईयर में महंगाई के 4.6 फीसदी रहने का अनुमान है। पहली तिमाही में यह 4 फीसदी, दूसरी तिमाही में 4.4 फीसदी, तीसरी तिमाही में 5.2 फीसदी और चौथी तिमाही में 4.7 फीसदी रह सकती है। ऊर्जा कीमतों में हालिया उछाल मुद्रास्फीति के लिए एक जोखिम के रूप में उभरा है। निकट भविष्य में खाद्य कीमतों का परिदृश्य अनुकूल बना हुआ है।
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