Bollywood conspiracy or coincidence: In films, Indian agencies are villains and ISI is trusted one.

Bollywood की साज़िश या संयोग: फिल्मों में भारतीय एजेंसियां होती हैं खलनायक और ISI होती है भरोसेमंद

नई दिल्ली। बॉलीवुड (Bollywood) के स्पाई-थ्रिलर सिनेमा में बीते कुछ वर्षों में एक दिलचस्प लेकिन विवादित ट्रेंड देखने को मिला है। हालिया रिलीज फिल्म धुरंधर, जिसे निर्देशक आदित्य धर ने बनाया है, को भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी सराहना मिली। लेकिन इसी बीच यूट्यूबर ध्रुव राठी, फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा और कुछ लोगों ने इसे “प्रोपेगेंडा फिल्म” करार दिया, जबकि यशराज फिल्म्स के स्पाई यूनिवर्स की तारीफ की।

यहीं से बहस तेज हो गई—क्या बॉलीवुड में एक नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, जिसमें भारतीय एजेंसियों को संदेह के घेरे में और पाकिस्तानी या ISI से जुड़े किरदारों को अपेक्षाकृत सकारात्मक रूप में दिखाया जा रहा है?

पिछले कुछ वर्षों की कई बड़ी फिल्मों और वेब सीरीज पर नजर डालें तो एक पैटर्न उभरता दिखाई देता है—खतरा बाहर से कम, भीतर से ज्यादा दिखाया जाता है। आइए उन फिल्मों और सीरीज पर नजर डालते हैं, जिनके जरिए यह बहस तेज हुई।

मैं हूँ ना (Main Hoon Na) 2004: दुश्मन देश के भीतर

निर्देशक फराह खान की इस ब्लॉकबस्टर फिल्म में भारत-पाक शांति वार्ता की पृष्ठभूमि है। स्वाभाविक रूप से दर्शक बाहरी दुश्मन की उम्मीद करते हैं, लेकिन कहानी मोड़ लेती है—मुख्य आतंकी एक भारतीय पूर्व सैन्य अधिकारी राघवन निकलता है, जो शांति प्रक्रिया का विरोधी है।

पाकिस्तानी पक्ष को अपेक्षाकृत समझदार और सहयोगी दिखाया गया। सवाल उठा—क्या यह संदेश दिया गया कि शांति का सबसे बड़ा विरोध भीतर से आता है?

 

एक था टाइगर (Ek Tha Tiger) 2012: ISI एजेंट बनी फिल्म की नायिका

निर्देशक कबीर खान की इस फिल्म में पहली बार मुख्यधारा सिनेमा में एक ISI एजेंट ज़ोया को रोमांटिक और सकारात्मक किरदार के रूप में प्रस्तुत किया गया। वहीं रॉ को ऐसे सिस्टम के रूप में दिखाया गया जो अपने एजेंटों से समझौता कर सकता है।

आलोचकों का प्रश्न रहा—क्या यह सिर्फ प्रेम कहानी थी, या आईएसआई की छवि को “मानवीय” और भरोसेमंद दिखाने की कोशिश?

 

टाइगर ज़िंदा है (Tiger Zinda Hai) 2017: RAW–ISI का जॉइंट ऑपरेशन

निर्देशक अली अब्बास ज़फर की इस फिल्म में आतंकवादी संगठन मुख्य दुश्मन है, लेकिन फिल्म का मजबूत संदेश RAW और ISI के सहयोग पर टिका है। ISI अधिकारियों को पेशेवर, भरोसेमंद और नैतिक दिखाया गया।

क्या यह सिर्फ सिनेमाई कल्पना है, या दर्शकों की सोच को धीरे-धीरे नया रूप देने की कोशिश?

 

वॉर (War) 2019: RAW के भीतर गद्दार

निर्देशक सिद्धार्थ आनद की इस एक्शन फिल्म में खतरा बाहरी नहीं, बल्कि RAW के भीतर से आता है। पाकिस्तान कहानी से लगभग गायब है।

क्या यह संदेश है कि असली संकट भीतर छिपा है?

 

पठान (Pathaan) 2023: एक्स-रॉ एजेंट बना देश का सबसे बड़ा खतरा

इस फिल्म में मुख्य खलनायक जिम एक पूर्व रॉ एजेंट है, जो देश के खिलाफ हो जाता है। वहीं ISI एजेंट रुबाई को मजबूत, नैतिक और सहयोगी के रूप में दिखाया गया। RAW-ISI की साझेदारी “वैश्विक भलाई” के लिए जरूरी बताई गई।

बहस यह रही—क्या यह पहली बड़ी ब्लॉकबस्टर थी, जिसमें भारतीय खुफिया अधिकारी को सबसे बड़ा खतरा दिखाया गया?

 

हैदर (Haider) 2014: सेना और सिस्टम पर सवाल

निर्देशक विशाल भरद्वाज की कश्मीर पृष्ठभूमि वाली फिल्म में भारतीय सुरक्षा बलों और तंत्र को कठघरे में रखा गया। पाकिस्तान को प्रत्यक्ष खलनायक के रूप में नहीं दिखाया गया।

क्या यह मानवीय कहानी थी या एकतरफा राजनीतिक दृष्टिकोण?

 

ख़ुफ़िया (Khufiya): देश के अंदर दुश्मन

इस जासूसी थ्रिलर में भी केंद्रीय संदेश यही है कि समस्या बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी है। ISI अधिकारियों को संतुलित और रणनीतिक रूप में दिखाया गया।

 

बार्ड ऑफ़ ब्लड (Bard of Blood) 2019: सिस्टम की विफलता

इस वेब सीरीज में भारतीय एजेंसियों की नीतिगत खामियों और अंदरूनी राजनीति पर जोर है। ISI को पूरी तरह खलनायक के रूप में पेश नहीं किया गया।

 

उलझ (Ulajh) 2024: देशभक्ति के कवर में सिस्टम पर सवाल

यह फिल्म शुरू में देशभक्ति से ओतप्रोत दिखती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ते ही संकट की जड़ भारतीय तंत्र के भीतर दिखाई जाती है। बाहरी दुश्मन न के बराबर रह जाता है।

 

बड़ा सवाल: संयोग या रणनीति?

फिल्म विशेषज्ञों का तर्क है कि यह बदलाव वैश्विक बाजार को ध्यान में रखकर किया गया है—जहां “नो नेशन, ओनली ह्यूमैनिटी (No Nation, Only Humanity)” का नजरिया बिकाऊ माना जाता है। वहीं आलोचकों का मानना है कि बार-बार भारतीय संस्थाओं को संदेहास्पद और ISI को अपेक्षाकृत सकारात्मक दिखाना एकतरफा नैरेटिव तैयार करता है, जो धीरे-धीरे जनमानस को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष

एक-दो फिल्में संयोग हो सकती हैं। लेकिन जब लगातार भारतीय किरदार खलनायक और पाकिस्तानी/ISI से जुड़े पात्र सहयोगी या नैतिक रूप में दिखाए जाएं, तो बहस स्वाभाविक है।

सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है—लेकिन वह सोच भी गढ़ता है। अंतिम फैसला दर्शकों को करना है: क्या यह महज कहानी कहने की कला है, या धारणा को दिशा देने की कोशिश?

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Shraddha V. Srivastava
Shraddha V. Srivastava
मीडिया जगत में अपनी बेबाक और धारदार पत्रकारिता के लिए पहचानी जाने वाली श्रद्धा पिछले 10 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। अपने करियर के दौरान उन्होंने देश की राजनीति, सामाजिक सरोकारों और समसामयिक मुद्दों पर गहराई से रिपोर्टिंग की है।
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