न्याय (Justice) लोगों का अधिकार है और इसे रोका नहीं जाना चाहिए: एडवोकेट अवधेश मिश्रा

कोरोना वायरस के चलते हुए देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान एसेंशियल सर्विसेज के तौर पर कुछ सेवाएं सुचारु रूप से जारी रहीं और नॉन-एसेंशियल्स सेवाएं रोक दी गयीं। देश के जूडिशियल सिस्टम के भी ऐसे ही नॉन-एसेंशियल कैटेगरी में शामिल होने के कारण लोगों को न्याय के लिए न सिर्फ काफी संघर्ष करना पड़ा बल्कि न्याय में देरी के कारण लोगों को परेशानी उठानी पड़ी। लॉकडाउन के दौरान बहुत से नए प्रैक्टिशनर वकीलों की जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक आमदनी बंद होने के चलते रोजमर्रा के जीवन में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ा। ऐसी ही कई समस्याओं की दूरदर्शिता पहचान कर सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने देश के जूडिशियल सिस्टम को एसेंशियल सर्विसेज़ में शामिल करने की मांग की थी।

 

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एडवोकेट अवधेश मिश्रा
एडवोकेट अवधेश मिश्रा

माईनेशन न्यूज़ के लखनऊ संवाददाता देवेंद्र ठाकुर व टीम के अन्य सदस्यों ने इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के अधिवक्ता अवधेश मिश्रा से मुलाकात कर लॉकडाउन के दौरान के जूडिशियल सिस्टम को लेकर हुयी समस्याओं पर बातचीत की।

 

 

 

वर्तमान पैंडेमिक समय में लीगल प्रोफेशनल्स की क्या स्थिति है?

पहले लॉकडाउन के बाद मई के महीने से कोर्टों का कार्य धीरे-धीरे शुरू किया गया। बाकी व्यवसाय और प्रोफेशनल्स की तरह लीगल प्रोफेशनल्स की स्थिति भी कुछ अच्छी नहीं रही है। बाकी व्यवसायों में सरकार की तरफ से सब्सिडी या सहायता मिल जाती है लेकिन लीगल प्रोफेशन में ऐसी कोई सुविधा न होने के कारण बहुत सी समस्याएं सामने आयीं। सामान्यतः वकील टैक्स-पेई होता है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वकीलों की कोई फिक्स आमदनी नहीं होती है और यह रोजमर्रा में मिलने वाले केसों और मुकदमों पर निर्भर होती है। जिस दिन कोई केस नहीं मिलता है उस दिन कोई आय नहीं होती है। वकालत की श्रेणियां अनुभव पर निर्भर करती हैं जैसे सबसे पहले जूनियर्स, फिर मिडिल और बाद में सीनियर। मिडिल लेविल प्रोफेशनल्स अपनी सेविंग्स करके रखते हैं और उनके पास पुराने भी कई केस हैं जिससे उनकी आमदनी पे खासा असर नहीं है और बंद के दौरान वो सर्वाइव कर सकते हैं। सीनियर वकील जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं व उनके सामने जीविकोपार्जन की कोई समस्या नहीं होती। इसमें सबसे बुरा असर जूनियर्स पर है वे क्योंकि अभी इस प्रोफेशन में नए हैं और काम ने मिल पाने के चलते रोजी-रोटी की समस्या हो गयी है। बहुत से ऐसे हैं जो अब वकालत छोड़ कर अपने घर वापस जा रहे हैं क्योंकि आमदनी का श्रोत बंद है।

 

क्या न्यायपालिका को एसेंशियल सर्विसेज़ में शामिल किया जाना चाहिए था?

हां, चूंकि हमारा देश डेमोक्रेटिक है इसलिए डेमोक्रेसी में न्याय भोजन से भी ज़्यादा एसेंशियल है। अगर डेमोक्रेसी न होती तो न्याय एसेंशियल नहीं होता। न्याय लोगों का अधिकार है और इसे रोका नहीं जाना चाहिए। वैसे भी दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन के दौरान जूडिशियल को एसेंशियल सर्विसेज़ की श्रेणी में ही रखा गया।

 

इस पैंडेमिक में न्यायपालिका की भूमिका को किस रूप में देखते हैं?

इस पैंडेमिक की अगर बात करें तो पहले लॉकडाउन के दौरान विधायिका और व्यवस्थापिका दोनों की अपना काम सुचारु रूप से कर रही थीं लेकिन लोकतंत्र के तीसरे स्तम्भ न्यायपालिका की स्थिति बहुत दुर्भाग्यपूर्ण रही है। न्यायपालिका ने अपने दरवाजे बंद कर लिए और लोगों को न्याय पाने से वंचित कर दिया जिसके चलते लोगों के न्याय पाने का अधिकार का हनन हुआ। पहले लॉकडाउन के दौरान पुलिस ने लोगों को मारा पीटा, फिर उसके बाद प्रवासी मजदूरों का मूवमेंट शुरू हुआ। चूंकि ऐसी स्थिति में न्यायपालिका के दरवाजे बंद थे तो लोग न्याय मांगने कहीं जा भी नहीं सकते थे। ऐसे आपातकाल की स्थिति में न्यायपालिका सभी का हेल्पिंग हैण्ड माना जाता है। यदि न्यायपालिका इस दौरान सुचारु रूप से कार्य करती तो ऐसी बहुत सी समस्याओं से आसानी से निजात मिल जाती, जो कि नहीं हुआ। इन सबके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हर जिले में हर एक थाने के लिए कोई एक जूडिशियल मजिस्ट्रेट नियुक होता है, लेकिन बावजूद इसके पूरे देश में लॉकडाउन के दौरान एक भी जूडिशियल मजिस्ट्रेट ने सामने आकर अपने थाने का निरीक्षण नहीं किया, किसी भी जूडिशियल मजिस्ट्रेट ने किसी भी जेल का निरीक्षण जरूरी नहीं समझा की जेलों में कैदियों को खाना मिल रहा है या नहीं या जेलों में कोरोनावायरस संक्रमण से बचाव की क्या तैयारियां की गयी हैं। सब्जी और फल बेचने वाला हो, या पुलिसकर्मी, सफाईकर्मी या मेडिकलवर्कर, सभी के लिए कोरोनावायरस का खतरा बराबर ही था। फिर भी यह सभी लोग अपना पूरी ईमानदारी से बिना डरे करते रहे। ऐसे में न्यायपालिका से जुड़े लोग अपने घरों में क्यों बैठ गए, जूडिशियल सिस्टम को शटडाउन क्यों कर दिया। समाज के लिए अपनी नैतिक जिम्मेदारी को भूल गए। यह पूरी तरह से अमानवीय रहा है और आने वाले समय में सोचने को विवश करता है कि ऐसी व्यवस्था बनायी जाए कि भविष्य में कभी भी ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।

 

जूडिशियल सिस्टम को ऑनलाइन करने की कोशिश की गयी, यह कैसा अनुभव रहा?

यह एक बहुत बढ़िया और सराहनीय कदम है लेकिन यह अभी भी आम आदमी के पहुंच से बाहर है। हालांकि जो बड़े और संपन्न वकील हैं, उनके लिए सिस्टम और इक्विपमेंट अरेंज करना बहुत आसान है। वो सभी इक्विपमेंट अपने घरों में लगाकर घर से काम कर रहे हैं लेकिन जो वकील संपन्न नहीं हैं, उनके लिए इक्विपमेंट अरेंज करना बहुत मुश्किल हो गया। जितनी मेहनत लोगों को कोर्ट न आने देने में लगायी गयी, अगर उसकी आधी ही मेहनत इस बात पर लगायी जाती कि किस जरूरतमंद को कोर्ट में आने देना है और उसके बाद लॉकडाउन की गाइडलाइंस को फॉलो करते हुए सुनवाई की जाती तो शायद कहीं अधिक बेहतर होता। इसके अलावा लॉकडाउन के दौरान न्याय की आस लगाए हुए लोगों के लिए एक नेशलन जूडिशियल हेल्पलाइन नंबर जारी कर देते जिसके जरिये टोकन दिया जाता और सुनवाई का समय दिया जाता।

 

जूडिशियल सिस्टम को अगर आगे भी ऑनलाइन बढ़ाना हो तो किस तरह से सुधार की जरूरत है?

ऑनलाइन जुडिशियल सिस्टम पैंडेमिक जैसे हालातों में एक अच्छा विकल्प है लेकिन हमेशा के लिए तो सिर्फ और सिर्फ ओपन कोर्ट का माध्यम ही सर्वोत्तम है। प्राचीनकाल से ही न्याय ओपन कोर्ट के माध्यम से ही होता आया है। अगर ऑनलाइन किया जाता है तो ऐसी सुविधा दी जाये की बाकी लोग भी हीयरिंग प्रोसीजर को देख व सुन सकें हालांकि उन्हें इंटरफीयर करने का अधिकार नहीं होना चाहिए और भविष्य के लिए रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध होनी चाहिए।

 

लीगल प्रोफेशनल्स के जीवन-स्तर में सुधार के लिए क्या-किया जा सकता है?
सभी प्रदेशों में लीगल प्रोफेशनल्स के लिए बार एसोसिएशन और देश में बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया पहले से मौजूद हैं। हालांकि मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि सभी वकीलों व उनके परिवार को हेल्थ इंश्योरेंस और टर्म इंश्योरेंस में सकरार की तरफ से सहायता मिलनी चाहिए।

 

देश में बड़ी संख्या में मौजूद पेंडिंग मुकदमों के निपटारे पर लॉकडाउन कितना असरदार रहा है?

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में पहले से बहुत सारे पेंडिंग मुक़दमे हैं और ऐसे में न्यायपालिका बंद है। आम लोगों तक न्याय नहीं पहुंच रहा है। लोगों की नौकरी जा रही है, मकान का किराया न पाने के कारण मकान मालिक ने घर का सामान कब्जा कर तालाबंदी कर दी है, व्यवसाय बंद हो रहे हैं। कर्ज में डूबा आदमी आत्महत्या करने को मजबूर है तो अगर ऐसे में न्यायपालिका ही बंद रहेगी तो लोगों को न्याय कैसे मिलेगा।

 

पैंडेमिक में गृह-मंत्रालय द्वारा संस्थाओं के लिए कर्मचारियों को नौकरी से न निकालने का जारी किया गया सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया जिसके बाद अलग-अलग कंनियों से असंख्य लोग नौकरी से निकाले गए। ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए था ?

पैंडेमिक के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने लेबर लॉ में अमेंडमेंट किया जो कि ऐसी स्थिति में नहीं करना चाहिए था। देश में लेबर की जिंदगी सबसे सस्ती नहीं हैं। कंपनियों को एक प्रकार की लिबर्टी दी गयी कि वो जैसे चाहे लेबर को उसे करें। मिनिमम वेज को भी चेंज किया गया। यदि सुप्रीम कोर्ट ने किसी सुनवाई के बाद गृह-मंत्रालय के सर्कुलर को ख़ारिज किया तो ऐसी स्थिति में सरकार और लेबर से जुड़े मंत्रालयों जैसे मानव संशाधन व अन्य मंत्रालयों को वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने नियमों का पालन करते हुए अपना निर्णय सुनाया तो सरकार रिव्यू पेटिशन दायर कर सकती थी जो नहीं किया गया। जो लोग नौकरियों से निकाले गए उनके पास कोर्ट जाने का विकल्प था लेकिन सबसे बड़ी समस्या यही है कि कोर्टे बंद चल रही हैं और ऐसे में न्याय के लिए लोगों को भटकना पड़ रहा है।

 

(एडवोकेट अवधेश मिश्रा पिछले डेढ़ दशकों से वकालत के प्रोफेशन में हैं व इनसे संपर्क करने के लिए पर adv.awdheshkumar@gmail.com मेल कर सकते हैं)

 

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