- Migrant Labourers: मध्यप्रदेश के सागर और उत्तर प्रदेश के औरैया में हुए हादसों में कई मजदूरों ने गंवाई जान
- प्रवासी मजदूरों का पलायन लगातार जारी, प्रश्नचिन्ह के मझधार में फंसा जीवन
मयंक शुक्ला की विशेष रिपोर्ट
दिल्ली। हादसों के बाद हादसे और हादसों में गरीब मजदूरों की मौत। वो मजदूर जिनका लॉकडाउन के चलते काम-काज बंद हो गया, वो मजदूर जो खुद के लिए और अपने बीवी बच्चों को खिलाने के लिए दो वक्त को रोटी जुटा पाने में असमर्थ हो चुका है। वो मजदूर जो हर सुबह काम पर जाता है, दिन भर मेहनत मजदूरी करता है और रात को थक कर सुकून की नींद सिर्फ यह सोचकर सोता है कि रोजाना शाम को मिलने वाली अपनी दिहाड़ी से परिवार के लिए वो कुछ कर पाता है जिसकी वजह से कम से कम उसके बीवी बच्चों को रात के समय भूखा तो नहीं सोना पड़ता है। लेकिन इस वैश्विक महामारी और इसके चलते हुए लॉकडाउन ने उसी मजदूर का यह सुकून भी छीन लिया और भूख से रोते बिलखते अपने बच्चों को देख उसे सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर अपने घर वापस आने को मजबूर होना पड़ा।
न कोई ट्रेन और न कोई बस और न ही कोई और साधन, जिसे जैसे समझ आया वैसे ही अपने घर अपने गाँव की तरफ चल दिया सिर्फ इस चाह में कि गाँव वापस जाकर वो अपने परिजनों से मिलेगा और कम से कम वहां उसके बच्चों को दो वक्त की रोटी मिल जाएगी। कोई मोटरसाइकिल से तो कोई साईकिल से, कोई ऑटो से तो कोई ट्रक से, और जिसे कुछ न मिला वो पैदल ही चल निकला सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर अपने गांव पहुँचने को। तपती दोपहर की धूप हो, या बेमौसम आंधी और बारिश, कोई भी इन गरीब मजदूरों की हिम्मत नहीं डिगा सका। लेकिन पिछले काफी समय से जस तरह से इन मजदूरों के साथ हुए हादसों की खबरें आ रही हैं वो दिल दहला देने वाली हैं।

आज मध्यप्रदेश के सागर और उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में हुए सड़क हादसे हों या महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ट्रेन से कटकर अपनी जान गंवा बैठे मजदूरों की खबर, बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देती है। औरंगाबाद में ट्रेन से मरने वाले मजदूरों के हादसे का दृश्य तो सबसे ज़्यादा भयानक था। ट्रेन की पटरियों के आसपास बिखरी रोटियां बहुत कुछ बयां करती हैं। रात उन मजदूरों ने भूख लगने के बाद कुछ रोटियां खाया होगा और कुछ बचा कर आगे के सफर के लिए रख दिया होगा थके होंगे, तो सोचा होगा कि कुछ आराम कर लें, उन्हें तो यही पता रहा होगा कि सभी ट्रेने बंद हैं क्योंकि वास्तविक दुनिया में ये मजदूर ट्विटर, फेसबुक, टीवी न्यूज क्या जाने, जो दूसरों के मुंह से सुना वही सच मान लिया। रात सोने से पहले सभी ने एक दूसरे को आगे के लम्बे सफर के लिए हौसला दिया होगा, अपने गाँव पहुंचने का दिलासा भी दिलाया होगा लेकिन क्या पता था कि इन बेचारे गरीब मजदरों की किस्मत में आने वाली सुबह ही नहीं है।

मजदूरों के साथ हुए हादसों की ऐसी ही बहुत सी खबरें आ रही हैं। घर के लिए निकलते वक्त अपने परिजनों को फोन के माध्यम से सूचना देते होंगे और रास्ते से भी कई बार अपने सकुशल होने की सूचना भी देते होंगे। साथ में सफर कर रहे अपने बच्चों की उनके दादी-बाबा व अन्य लोगों से बात भी कराते होंगे या जिनके बीवी बच्चे उनके गांव-घरों में हैं रास्ते से अपने बीवी बच्चों को अपने कुशलतापूर्वक पहुंचने की सांत्वना देते होंगे लेकिन महज एक हादसा किस तरह से एक गरीब मजदूर का परिवार बिखेर दे, यह बात कल्पना से भी ज़्यादा परे है।
इन सब के बावजूद भी प्रवासी मजदूर चला जा रहा है अपने गांव अपने घर की तरफ, सभी बातों से अनजान, हौसलों से भरा हुआ फिर चाहे तपती धूप हो या ओलों वाली बारिश या तूफ़ान, भूख से निढाल है, अपने बच्चों के साथ साथ ढेरों सामान का भी बोझ उठाये हुए, वो बढ़ा चला जा रहा है अपनी मंजिल की तरफ। इन सब के बीच उनकी मदद को मानवता के कुछ हाथ भी सामने आते हैं। समाज में आज भी मानवता जिन्दा है, इस बात को साबित करते हुए बहुत से लोग मदद को सामने आये हैं। लोग अपने घरों में या किसी एक स्थान पर खाना बनाकर उन्हें अच्छे से पैक कर व पानी के साथ इन प्रवासी मजदूरों को मुहैया करा रहे हैं।

कहने को तो मजदूर दिवस मनाया जाता है लेकिन आज इन प्रवासी मजदूरों की सुध लेने के लिए सरकारें क्या कर रही हैं, मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने मात्र से क्या उन रोते बिलखते असहाय परिवारों का दर्द ख़तम हो जायेगा। क्या मुआवजा भविष्य में होने वाली ऐसी किसी घटनाओं और हादसों पर विराम लगा देगा। कभी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने लिखा था “मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये!” जो आज सिर्फ किताबी पाठ्यक्रमों की कविताओं तक ही सिमट कर रह गया है और इन मजदूरों का जीवन एक प्रश्नचिन्ह के मझधार में कहीं उलझ कर रह गया है।
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